माँ और पिता: ज़िम्मेदारियों की दो अनकही यात्राएँ
माँ और पिता: ज़िम्मेदारियों की दो अनकही यात्राएँ “माँ 9 महीने बच्चे को पेट में रख कर संभालती है और बाप जीवन भर की नाव संभालता है।” यह एक साधारण सा वाक्य नहीं, बल्कि माँ-बाप के त्याग, संघर्ष और प्रेम का पूरा दर्शन है। यह पंक्ति हमें याद दिलाती है कि जीवन की शुरुआत से लेकर उसके हर पड़ाव तक, माता-पिता किस तरह चुपचाप अपनी जिम्मेदारियाँ निभाते रहते हैं। माँ की भूमिका जीवन की पहली धड़कन से शुरू होती है। नौ महीने तक वह न सिर्फ बच्चे को अपने गर्भ में रखती है, बल्कि अपने सपनों, आराम और इच्छाओं को भी पीछे छोड़ देती है। उसका शरीर बदलता है, उसका मन बदलता है, और उसका पूरा अस्तित्व आने वाले जीवन के लिए समर्पित हो जाता है। माँ का प्रेम जन्म के साथ खत्म नहीं होता, बल्कि हर बुखार, हर डर और हर आँसू के साथ और गहरा होता चला जाता है। वहीं पिता की जिम्मेदारी अक्सर शब्दों में नहीं, कर्मों में दिखती है। वह जीवन की नाव को संभालता है—तूफानों में भी, मुश्किलों में भी। कभी अपनी थकान नहीं दिखाता, कभी अपने डर ज़ाहिर नहीं करता। वह खामोशी से परिवार की ज़रूरतों को अपने कंधों पर उठाए चलता रहता है, ताकि उसके बच्चे...