कानों में घुलता ज़हर

 

कानों में घुलता ज़हर: एक कहानी जो हमें शब्दों की कीमत सिखाती है

हम ज़हर को अक्सर केवल खाने-पीने से जोड़कर देखते हैं। अगर गलती से भी कोई ज़हरीली चीज़ खा ले, तो घबराहट होती है, डॉक्टर के पास दौड़ लगती है और इलाज शुरू हो जाता है।

लेकिन जीवन में एक ऐसा ज़हर भी होता है, जो न दिखता है, न टेस्ट में पकड़ में आता है—यह ज़हर कानों के रास्ते दिल और दिमाग तक पहुँचता है।

इस ज़हर का नाम है—कड़वे शब्द।

कहानी: राहुल की खामोशी

राहुल पढ़ाई में सामान्य था। न बहुत तेज़, न बहुत कमजोर।
लेकिन उसके आसपास के लोग उसे अक्सर कहते रहते—

“तू कुछ नहीं कर पाएगा।”
“तेरे बस की बात नहीं है।”
“देख, बाकी बच्चे कितने होशियार हैं।”

शुरुआत में राहुल चुप रहता।
वह सोचता—सब मुझे सुधारने के लिए कह रहे हैं।

पर धीरे-धीरे ये शब्द उसके कानों से उतरकर उसके मन में बैठने लगे।

ज़हर जो दिखता नहीं

एक दिन स्कूल में राहुल अचानक बेहोश हो गया।
डॉक्टर ने कहा—
“शरीर में कोई बीमारी नहीं है, न ही कोई ज़हर खाया है।”

फिर भी राहुल अंदर से टूटता जा रहा था।
वह हँसना भूल चुका था।
क्लास में हाथ उठाना बंद कर चुका था।
उसे खुद पर भरोसा नहीं रहा था।

किसी ने पूछा भी नहीं—
👉 उसके कानों में रोज़ क्या डाला जा रहा है?

जब सच सामने आया

एक दिन स्कूल की काउंसलर ने राहुल से अकेले में बात की।
धीरे-धीरे राहुल रो पड़ा और बोला—

“मैडम, मैंने कभी ज़हर नहीं खाया…
लेकिन मैंने रोज़ सुना है कि मैं बेकार हूँ।”

उस दिन काउंसलर ने बस एक बात कही—

“खाने का ज़हर शरीर को मारता है,
लेकिन कानों में डाला गया ज़हर
इंसान को जीते-जी तोड़ देता है।”

शब्दों की ताकत

उस दिन के बाद राहुल के आसपास के लोगों ने अपने शब्द बदले।
अब वे कहते—

“तू कोशिश कर सकता है।”
“गलती से सीख मिलती है।”
“हमें तुझ पर भरोसा है।”

धीरे-धीरे राहुल बदलने लगा।
वही बच्चा, जो खामोश हो गया था,
फिर से सवाल पूछने लगा,
फिर से सपने देखने लगा।

कहानी से सीख

इस कहानी में राहुल अकेला नहीं है।
हम सब कभी न कभी राहुल होते हैं—
और कई बार अनजाने में वही लोग भी,
जो दूसरों के कानों में ज़हर डाल देते हैं।

शब्दों का ज़हर क्या करता है?

  • आत्मविश्वास तोड़ता है

  • रिश्तों में दूरी लाता है

  • डर और हीनभावना पैदा करता है

  • इंसान को खुद से नफरत सिखाता है

सबसे खतरनाक बात यह है कि
👉 इसका इलाज कोई डॉक्टर नहीं करता।

हमारी ज़िम्मेदारी

हर इंसान के पास दो रास्ते होते हैं—
या तो शब्दों से ज़हर फैलाए
या शब्दों से ज़िंदगी सँवारे।

बोलिए, लेकिन सोचकर।
सच कहिए, लेकिन संवेदना के साथ।

निष्कर्ष

खाने में ज़हर डालने वाले से हम बच सकते हैं,
लेकिन
कानों में ज़हर डालने वाले शब्दों से बचना सबसे मुश्किल है।

इसलिए याद रखिए—

शब्द अगर मरहम बन जाएँ,
तो टूटे हुए इंसान भी खड़े हो जाते हैं।


 शायद हम कभी यह नहीं जान पाते कि हमारे बोले गए शब्द किसी के भीतर क्या बना रहे हैं—

हिम्मत या डर, उम्मीद या टूटन।

एक वाक्य किसी को सालों पीछे धकेल सकता है,
और वही एक वाक्य किसी को दोबारा खड़ा भी कर सकता है।

इसलिए अगली बार जब आप किसी बच्चे, दोस्त, सहकर्मी या अपने ही परिवार से बात करें,
तो याद रखिए—

आपके शब्द सिर्फ आवाज़ नहीं हैं,
वे किसी की सोच, आत्मविश्वास और भविष्य की नींव हैं।

अगर आप किसी के कानों तक पहुँच रहे हैं,
तो कोशिश करें कि वहाँ ज़हर नहीं,
बल्कि ऐसा भरोसा पहुँचे
जिससे वह इंसान खुद पर यकीन करना सीख सके।

क्योंकि
दुनिया को और आलोचक नहीं,
थोड़ा और हौसला देने वाले इंसानों की ज़रूरत है।

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